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सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में फैसला मांगा, पैकेज्ड खाद्य में चीनी‑नमक‑वसा पर चेतावनी लेबल अनिवार्य?

सुप्रीम कोर्ट ने एक सार्वजनिक हित याचिका के जवाब में केंद्र को कहा कि यदि सरकार खुद कदम नहीं उठाती तो आगे निर्देश जारी करेंगे; अदालत ने बड़ी कंपनियों के पैकेज्ड खाद्य में उच्च शर्करा, नमक और संतृप्त वसा पर फ्रंट‑ऑफ़‑पैक चेतावनी लेबल लगाने की मांग पर दो हफ्तों की समय सीमा दी। वर्तमान में भारत में केवल 2020 की लेबलिंग नियमावली लागू है, जो लाल चेतावनी लेबल को अनिवार्य नहीं बनाती, जबकि सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मानकों को सीधे अपनाने पर सावधानी जताई।

27 अगस्त 2026 को 07:55 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में फैसला मांगा, पैकेज्ड खाद्य में चीनी‑नमक‑वसा पर चेतावनी लेबल अनिवार्य?

सौजन्य से:- Navbharat Times

लेकिन इस मामले को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि FOPL यानी Front-of-Pack Warning Labels क्या है? अभी भारत में कौन-सी लेबलिंग व्यवस्था लागू है? सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है? और सरकार के सामने असली कानूनी सवाल क्या है?

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सुप्रीम कोर्ट में मामला और केंद्र को दो हफ्ते का समय

- यह मामला एक Public Interest Litigation (PIL) से जुड़ा है, जिसमें पैकेज्ड फूड में अधिक मात्रा में Sugar, Salt और Saturated Fat होने पर सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी देने की मांग की है।

- 27 अगस्त 2026 की सुनवाई में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र से Front-of-Pack Warning Labels पर फैसला लेने को कहा।

- अदालत ने संकेत दिया कि यदि सरकार स्वयं कदम उठाती है तो वह स्वागत योग्य होगा, लेकिन ऐसा नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट आगे निर्देश जारी कर सकता है।

- यानी अदालत के सामने सिर्फ पैकेट के डिजाइन का सवाल नहीं, बल्कि उपभोक्ता को स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी किस तरह और कितनी स्पष्टता से दी जाए, यह बड़ा नियामक और संवैधानिक प्रश्न है।

FSSAI का प्रस्तावित ढांचा और Front-of-Pack Warning Label

FSSAI के एक प्रस्तावित ढांचे में कंपनियों के डब्बाबंद खाने पीने की चीजों के पैक पर FOPNL, Front-of-Pack Warning Label को सरल न्यू्ट्रीशन वैल्यू दर्शाने के रूप में बताया गया था। प्रस्ताव में चीनी की मात्रा, नमक की मात्रा और संतृप्त वसा की कु मात्रा की जानकारी देने जैसी अवधारणा भी शामिल थी। इसका उद्देश्य यह है कि ग्राहक को खरीदारी के समय पूरे पैकेट का न्यूट्रीशनल वैल्यू पढ़ने और गणना करने की जरूरत न पड़े। सामने ही प्रमुख पोषक तत्वों से जुड़े जोखिम का संकेत मिल सके।AIIMS ऋषिकेश की बड़ी लापरवाही, स्वस्थ इंसान को बताया HIV पीड़ित, फिर उपभोक्ता कानूनों ने सिखाया सबक, जानें पूरा मामला

क्या भारत में अभी से हर पैकेट पर लाल Warning Label लगाना अनिवार्य है?

दरअसल यही इस स्टोरी का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य है। अभी भारत में अभी से हर पैकेट पर लाल चेतावनी वाला लेबल लगाना जरूरी नहीं है। भारत में पहले से Food Safety and Standards (Labelling and Display) Regulations, 2020 लागू हैं, जिन में प्री पैकेज्ड फूड्स की लेबलिंग और न्यूट्रिशनल जानकारी से जुड़े प्रावधान हैं। FSSAI की उपलब्ध रेगुलेटरी सामग्री में न्यूट्रिशनल जानकारी के तहत एनर्जी, फैट, सैचुरेटेड फैट, ट्रांस फैट, कोलेस्ट्रॉल, सोडियम और शुगर जैसी जानकारी से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।Sugar Free Products पर बढ़ी कानूनी चुनौती, Artificial Sweeteners को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और FSSAI से मांगा जवाब; जानिए पूरा मामला

केंद्र सरकार ने Warning Label का विरोध क्यों किया?

सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से सुनवाई में यह चिंता रखी गई कि अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारत में उसी तरह लागू करने से कुछ पारंपरिक भारतीय खाद्य उत्पाद भी चेतावनी वाली श्रेणी में आ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर नमकीन और अंडो़ं का उल्लेख हुआ। सरकार की ओर से यह तर्क रखा गया कि भारत का डाईटरी पैटर्न या तरीका दूसरे देशों से अलग है और विकसित देशों के न्यूट्रीशन वैल्यू को सीधे अपनाना उचित नहीं हो सकता।अदालत की आपत्ति सरकार की इसी तरह की दलीलों पर थी। कोर्ट ने सवाल उठाया और इस बात पर जोर दिया कि भारत को आम जनों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि उपभोक्ता को जानकारी देने का मतलब यह नहीं है कि उसे कोई उत्पाद खरीदने से रोका जा रहा है।

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अब आगे क्या होगा? क्या कंपनियों को तुरंत नए लेबल लगाने होंगे?

- 27 अगस्त की सुनवाई में केंद्र को दो सप्ताह के भीतर अपना निर्णय स्पष्ट करने का समय मिला है। यदि सरकार स्वयं कोई प्रभावी नियामकीय कदम उठाती है तो उसके बाद लागू होने वाली अधिसूचना/नियम, उसका दायरा, अनुपालन समय-सीमा और किन खाद्य उत्पादों पर व्यवस्था लागू होगी, ये सब अलग-अलग कानूनी प्रश्न होंगे।,

- यदि केंद्र की ओर से संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती, तो सुप्रीम कोर्ट ने आगे निर्देश जारी करने का संकेत दिया है। इसलिए उपभोक्ताओं के लिए अभी सबसे जरूरी बात यह समझना है कि अदालत ने सरकार को फैसला लेने के लिए स्पष्ट समयसीमा दी है।

- आखिर में यह बात कि फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि कंपनियों को अपने डब्बा बंद खाद्य उत्पादों पर तुरंत नए लेबल लगाने होंगे। क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट की ओर से warning label लगाने का फैसला अभी अपने अंजाम तक नहीं पहुंचा है।

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