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ट्रंप के नए कानून से भारत के निर्यात पर 100% टैरिफ का खतरा, व्यापार जगत में घबराहट

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित 'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' के तहत शीर्ष पाँच देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जिसमें भारत भी शामिल है। इस कदम से भारत के लेदर, इंजीनियरिंग, कपड़ा और फार्मास्यूटिकल जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में भारी गिरावट और निर्यातकों में भविष्य के निर्णय लेने में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

19 सितंबर 2026 को 01:04 pm बजे
ट्रंप के नए कानून से भारत के निर्यात पर 100% टैरिफ का खतरा, व्यापार जगत में घबराहट

सौजन्य से:- ETV Bharat

अमेरिकी कानून से भारतीय सामानों पर लग सकता है 100% टैरिफ, एक्सपोर्टर्स बोले- 'फैसले लेना हुआ मुश्किल'

अमेरिकी प्रतिबंध कानून से भारत का निर्यात संकट में है; राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा 100% आयात शुल्क की धमकी से भारतीय निर्यातक बेहद चिंतित हैं.

Published : September 19, 2026 at 5:09 PM IST

नई दिल्ली: अमेरिका में पारित एक नए कानून ने भारत के निर्यातकों और व्यापार जगत की चिंताएं बढ़ा दी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित 'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' के कारण दोनों देशों के बीच मजबूत द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं. इस नए कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत से आने वाले सामानों पर 100 फीसदी तक टैरिफलगाने का अधिकार मिल गया है. भारतीय निर्यातकों का कहना है कि यदि यह टैरिफ लागू किया गया, तो अमेरिका को होने वाला भारत का निर्यात पूरी तरह ठप हो सकता है.

क्या है नया अमेरिकी कानून?

18 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सख्त कानून पर हस्ताक्षर किए हैं. यह कानून मुख्य रूप से रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ उन देशों को निशाना बनाता है जो मॉस्को से कच्चे तेल और गैस की बड़ी खरीदारी कर रहे हैं.

कानून के प्रावधानों के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप को उन शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक का दंडात्मक शुल्क लगाने का अधिकार है, जिन्होंने कानून लागू होने से पिछले 12 महीनों में सबसे अधिक मात्रा में रूसी क्रूड ऑयल या नेचुरल गैस खरीदी है. भारत इस सूची में शामिल है, जिसके चलते भारतीय मैन्युफैक्चरर्स और ट्रेडर्स में हड़कंप मच गया है. यह कानून हस्ताक्षर होने के 30 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाएगा.

निर्यातकों में भारी डर, व्यापार ठप होने की आशंका

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (FIEO) के अध्यक्ष एस. सी. रल्हन ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा, "हम इस कदम से बेहद चिंतित हैं. अगर अमेरिका ने इतना भारी आयात शुल्क लगा दिया, तो हमारा वहां होने वाला निर्यात पूरी तरह रुक जाएगा. कोई भी अमेरिकी आयातक या खरीदार इतनी ऊंची दरों पर शुल्क का भुगतान नहीं कर सकता." उन्होंने आगे कहा कि भारत के इंजीनियरिंग और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर का अमेरिका में बहुत बड़ा बाजार है. वाशिंगटन को कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले इन जमीनी हकीकतों और दोनों देशों के पुराने व्यापारिक रिश्तों पर विचार करना चाहिए.

इसी तरह, मुंबई के प्रमुख निर्यातक और टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज के सीएमडी शरद सराफ का मानना है कि टैरिफ से भी ज्यादा खतरनाक मौजूदा अनिश्चितता का माहौल है. उन्होंने कहा, "सटीक असर तभी पता चलेगा जब अमेरिका टैरिफ की दरें, प्रभावित होने वाले प्रॉडक्ट्स की लिस्ट और इसे लागू करने का शेड्यूल जारी करेगा. इस अनिश्चितता के कारण हम आगे के व्यापारिक फैसले नहीं ले पा रहे हैं. हमें यह भी देखना होगा कि चीन जैसे हमारे प्रतिस्पर्धी देशों पर कितना शुल्क लगाया जाता है." सराफ ने यह भी संकेत दिया कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन का यह कदम भारत जैसे देशों पर दबाव बनाने की रणनीति हो सकता है.

इन प्रमुख सेक्टरों पर पड़ेगा सबसे बुरा असर

भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात में कई ऐसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं जो सीधे तौर पर लाखों रोजगारों से जुड़े हैं:

- चमड़ा और फुटवियर उद्योग: फरीदा ग्रुप के चेयरमैन रफीक अहमद ने बताया कि उनके कुल निर्यात का 65 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका जाता है. ड्यूटी में किसी भी तरह की बढ़ोतरी इस पूरे सेक्टर की कमर तोड़ देगी.

- इंजीनियरिंग और लोहा-स्टील: इंजीनियरिंग सामान और ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों का अमेरिकी बाजार पर बड़ा दारोमदार है.

- कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट्स: भारत से जाने वाले कॉटन और रेडीमेड कपड़ों की कीमतों में भारी उछाल आएगा, जिससे वे अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे.

- फार्मास्युटिकल और रत्न-आभूषण: ड्रग फॉर्मूलेशन, बायोलॉजिकल्स, कीमती रत्न और सोने के आभूषणों के निर्यात पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है.

विशेषज्ञों की राय: 'ऊर्जा सुरक्षा से समझौता न करे भारत'

आर्थिक मामलों के थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार को सतर्क किया है. GTRI के अनुसार, इस कानून का इस्तेमाल भारत पर रूसी तेल की खरीद कम करने और अमेरिका के पक्ष में एकतरफा द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है.

श्रीवास्तव ने कहा, "भारत को अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा का सौदा अमेरिकी टैरिफ से मिलने वाली किसी अस्थायी राहत के लिए बिल्कुल नहीं करना चाहिए. इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने यूरोपीय संघ (EU), जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अपने बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट होने के बावजूद नए टैरिफ थोपे हैं. इसलिए भारत को अमेरिकी धमकियों के आगे झुककर अपनी तेल नीति नहीं बदलनी चाहिए."

मजबूत द्विपक्षीय व्यापार दांव पर

यह संकट ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार नई ऊंचाइयों को छू रहा था. दोनों देशों ने साल 2030 तक आपसी व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार

वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 6.5 प्रतिशत बढ़कर 140.76 अरब डॉलर रहा था.

मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 (अप्रैल-अगस्त) के शुरुआती पांच महीनों में ही भारत का अमेरिका को मर्चेंडाइज निर्यात 6.17 प्रतिशत की बढ़त के साथ 42.8 अरब डॉलर पहुंच चुका है, जबकि आयात 29.6 प्रतिशत बढ़कर 28 अरब डॉलर रहा.

इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2026 में भारत का सॉफ्टवेयर सर्विसेज निर्यात करीब 120 अरब डॉलर का रहा था.

अब भारतीय निर्यात जगत की निगाहें पूरी तरह से नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच होने वाली कूटनीतिक वार्ताओं पर टिकी हैं. निर्यातक उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार बातचीत के जरिए भारत के लिए 'टैरिफ छूट' हासिल करने में सफल रहेगी, ताकि त्योहारों के इस सीजन में भारतीय उद्योगों को भारी नुकसान से बचाया जा सके.

यह भी पढ़ें- खाड़ी देशों में सैन्य टकराव गहराया: एक्सपर्ट्स बोले— भारत तुरंत अपनाए 'मल्टी-रूट एनर्जी स्ट्रेटेजी'

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