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स्कूलों में माहवारी स्वच्छता की रिपोर्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने की कड़ी टक्कर

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की औपचारिक रिपोर्टों को केवल कागज पर बना रहने की आलोचना की, जिसमें वास्तविक स्कूल‑स्तर की स्थिति नहीं बताई गई। अदालत ने प्रत्येक राज्य को विस्तृत आंकड़े, कमी के कारण और सुधार का समय‑सीमा सहित अगली रिपोर्ट पेश करने और जिला शिक्षा अधिकारियों को स्कूल‑समीक्षा टीमों से निरीक्षण करवाने का निर्देश दिया। साथ ही, पर्यावरण‑अनुकूल बायोडिग्रेडेबल नैपकिन के मानकों को ISO 17088 और IS 5405 के अनुरूप करने का आग्रह किया, अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को निर्धारित हुई।

16 सितंबर 2026 को 04:04 pm बजे
स्कूलों में माहवारी स्वच्छता की रिपोर्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने की कड़ी टक्कर

सौजन्य से:- Navbharat Times

स्कूलों में छात्राओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता की सुविधाओं के अनुपालन की रिपोर्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि कई रिपोर्टें महज औपचारिकता हैं और जमीनी स्थिति नहीं बतातीं। अदालत ने कहा कि प्रक्रिया धीमी हो सकती है लेकिन यह मतलब की होनी चाहिए।

अदालत ने क्या-क्या कहा?

अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार वास्तव में सार्थक हो।जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच ने जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में अनुपालन की मॉनिटरिंग करते हुए निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि मासिक धर्म, राइट टु हेल्थ को सार्थक बनाने के लिए काफी प्रगति हुई है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।- केंद्र और राज्यों से मांगी गई अनुपालन रिपोर्टों की समीक्षा के दौरान कोर्ट ने कहा कि कुछ राज्यों ने ऐसे मामलों में भी केवल आंकड़ों या हां-नहीं के जवाब से अनुपालन दर्शा दिया, जहां विस्तृत और तथ्यात्मक जानकारी की जरूरत थी। कोर्ट ने इसे 'दिमाग लगाए बिना जवाब देना या महज औपचारिकता' बताया।

- मिसाल के तौर पर कुछ राज्यों ने शौचालयों की पूर्ण कवरेज का दावा किया, जबकि विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए उपलब्ध शौचालयों की संख्या कुल स्कूलों से कम थी। असम के हाथ धोने की सुविधाओं के आंकड़े उसके कुल स्कूलों की संख्या से मेल नहीं खाते थे। तमिलनाडु ने भी पूर्ण कवरेज का दावा किया, जबकि जेंडर-सेग्रिगेटेड शौचालय वाले स्कूलों की संख्या कुल स्कूलों से काफी कम थी।

- कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन और नैपकिन उपलब्ध कराने के आंकड़ों पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए। बिहार, गुजरात, दिल्ली, झारखंड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की वेस्ट डिस्पॉजल व्यवस्था से जुड़े आंकड़ों में भी विसंगतियां पाई गईं। पंजाब की रिपोर्ट पढ़ने योग्य नहीं थी।

अब रिपोर्ट में कमियों की जानकारी देनी होगी

कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली रिपोर्ट में प्रत्येक राज्य और UT को बताना होगा कि कितने स्कूलों में अभी भी वर्किंग, अलग-अलग शौचालय नहीं हैं, उपयोग योग्य पानी की सुविधा कहां नहीं है, गोपनीयता और दिव्यांग बच्चों की पहुंच की स्थिति क्या है, मासिक धर्म संबंधी सामग्री उपलब्ध है या नहीं और कचरा निस्तारण की व्यवस्था काम कर रही है या नहीं। इसके साथ हर कमी का कारण और उसे दूर करने में लगने वाला समय भी बताना होगा।DEO की टीमें करेंगी स्कूलों का औचक निरीक्षण

कोर्ट ने जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को शिक्षकों की टीमें गठित कर अपने जिले के सभी स्कूलों में औचक निरीक्षण कराने का निर्देश दिया है। टीमें शौचालय, पानी, धुलाई की सुविधा, सैनिटरी नैपकिन, कचरा निस्तारण और मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी जागरूकता उपायों की स्थिति देखेंगी। छात्रों से मिले फीडबैक और निरीक्षण से सामने आए निष्कर्ष भी राज्यों को कोर्ट के समक्ष रखने होंगे।अब पर्यावरण अनुकूल सैनिटरी नैपकिन

सुप्रीम कोर्ट ने सैनिटरी नैपकिन की निर्धारित संरचना में भी बदलाव किया है। पहले ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल नैपकिन और ASTM D-6954 मानक का उल्लेख था। अब इसकी जगह ISO 17088 के साथ IS 5405 मानकों के अनुरूप बायोडिग्रेडेबल, बायोकम्पैटिबल और कंपोस्टेबल सैनिटरी नैपकिन की आवश्यकता होगी।- कोर्ट ने कहा कि इससे हानिकारक रसायनों और पर्यावरण पर पड़ने वाले लंबे समय के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी। राज्यों को धीरे-धीरे अधिक पर्यावरण अनुकूल और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित विकल्पों की ओर बढ़ने को कहा गया है, जिनमें कपड़े के पुन: उपयोग योग्य पैड, मेंस्ट्रुअल कप और पीरियड पैंटी शामिल हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी।

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